October 22, 2021

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इंजिनियरों का देवता व देवताओं का इंजिनियर विश्वकर्मा भगवान

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रिपोर्ट – सद्दाम हुसैन

देवरिया: (उ0प्र0) देवरिया जिले के भटनी क्षेत्र मे आज हम विश्वकर्मा पूजा को विश्वकर्मा दिवस या जयंती के रुप मे मना रहे है। विश्वकर्मा जयंती को प्रतिवर्ष सितम्बर के महीने में उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व लगभग पुरे भारत में विधि के अनुसार मनाया जाता है।इस दिन सबसे बड़े वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। इतिहास के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी की देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। उन्हें त्रिलोका या त्रिपक्षीय युग का भी निर्माता माना जाता है।साथ ही विश्वकर्मा जी में अपने शक्ति से देवताओं के उड़ान रथ, महल और हथियार का भी निर्माण किया था। यह भी माना जाता है की इंद्र का महा अस्त्र जो महर्षि दधिची के हड्डियों से बना हुआ था, वह भी विश्वकर्मा भगवान द्वरा ही बनाया गया था।सिर्फ स्वर्ग ही नही बल्कि उन्हें इस पुरे सृष्टि का निर्माता माना जाता है। उन्होंने सत्य युग में भगवान शंकर के लिए सोने की लंका बनायी। जिसे भगवान शंकर ने गृह प्रवेश के समय विश्वश्रवा को दान दे दिये। जहाँ असुर राज रावण रहा करता था। त्रेता युग में द्वारका शहर को बनाया जहाँ श्री कृष्ण रहा करते थे, द्वापर युग में हस्तिनापुर शहर का निर्माण किया जो पांडवों और कौरवों का राज्य था, सभी का निर्माता उनको माना जाता है।विश्वकर्मा पूजा लगभग सभी दफ्तरों और कार्यालयों मे मनाया जाता है। खास तौर पर इंजिनियर, आर्किटेक्ट, चित्रकार, मैकेनिक, वेल्डिंग दुकान वालें, या कारखानों में इसको मुख्य तौर से मनाया जाता है। इस दिन ऑफिस और कारखानों के लोग अपने कारखानों और कार्यालयों की अच्छे से साफ़-सफाई करते हैं और विश्वकर्मा भगवान के मिटटी की मूर्तियों को पूजा के लिए सजाते हैं। घरों में भी लोग अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, घर और गाडी-मोटर की पूजा करते हैं।उत्तर भारत में यह पूजा बड़े उल्लास के साथ मनाई जाती है। इस पूजा में आदि शिल्पकार और वास्तुकार “भगवान विश्वककर्मा” की पूजा की जाती है। इस दिन सभी राजमिस्त्री, बुनकर, कारीगर जो लोहे और अन्य धातुओं से वस्तु निर्माण करते है, इंजीनियर, राजमिस्त्री, मजदूर, शिल्पकार, कामगार, हार्डवेयर, इलेक्ट्रिशियन, टेक्निशियन, ड्राइवर, बढ़ई, वेल्डर, मकेनिक, सभी औद्योगिक घराने के लोग इस पूजा को बड़े धूमधाम से मनाते है। इस दिन कारखानों, वर्कशाप की साफ़ सफाई की जाती है। गुब्बारे, रंग बिरंगे कागजों से कार्यस्थल को सजाया जाता है। औजारों की सफाई, रंगाई पुताई की जाती है। सभी लोग सुबह नहाकर पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की फोटो लगाते है। उस पर फूल माला चढ़ाते है। धूप, दीपक, अगरबत्ती जलाकर औजारों की पूजा की जाती है। फिर प्रसाद का भोग लगाकर हाथ में फूल और अक्षत लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते है। ‘‘ऊॅ श्री श्रीष्टिनतया सर्वसिधहया विश्वकरमाया नमो नमः” मंत्र का उच्चारण करते है। हवन करने के बाद आरती पढ़ते है। फिर सभी को प्रसाद दिया जाता है। सभी कारीगरों को इस पूजा का इंतजार रहता है। इस दिन दुकान या फैक्ट्री में काम नही होता है। सिर्फ पूजा की जाती है। इस पूजा के अगले दिन “भगवान विश्वककर्मा” की मूर्ति स्थापित की जाती है। उसका विसर्जन भी बहुत धूमधाम से किया जाता है। भक्त अबीर गुलाल लगाकर संगीत के साथ गाते नाचते झूमते हुए “भगवान विश्वककर्मा” की प्रतिमा निकालते है। लोगो को प्रसाद वितरण होता रहता है। इस पूजा में सभी कर्मचारी भगवान विश्वकर्मा से नया और कुशल शिल्पज्ञान, वास्तुज्ञान मांगते है और कहते है की शिल्प करते समय, कोई भवन, इमारत बनाते समय कोई दुर्घटना न हो। इस दिन श्रम की पूजा भी की जाती है। बिना श्रम के कुछ भी नया निर्माण कर पाना संभव नही है। “भगवान विश्वककर्मा” का जन्म या शुरुवात

की मान्यता है कि भगवान विष्णु की नाभि- कमल से ब्रह्मा जी उपत्त्न हुए थे। उन्होंने सृष्टि की रचना की। उनके पुत्र धर्म के सातवें पुत्र थे भगवान विश्वककर्मा। उनको जन्म से ही वास्तुकला में महारत प्राप्त थी। हम सभी के जीवन में शिप्ल का अत्यधिक महत्व है। कोई भी घर, मकान, भवन, नवीन रचना का काम शिल्प के अंतर्गत ही आता है। कुशल शिल्प विद्या और ज्ञान से मनुष्य विशाल इमारते, पुल, वायुयान, रेल, सड़क पानी के जहाज, वाहन आदि बनाता है। इसलिए हम सभी के जीवन में शिल्प विद्या का शुरू से महत्व रहा है। आधुनिक समय में इंजीनियर, मिस्त्री, वेल्डर, मकेनिक जैसे पेशेवर लोग शिल्प निर्माण का काम करते आ रहे है।

इसलिए मनुष्य के जीवन में सदैव विश्वकर्मा पूजा का महत्व है। यदि मनुष्य के पास शिल्प ज्ञान न हो तो वह कोई भी भवन, इमारत नही बना पायेगा। इसलिए भगवान विश्वकर्मा को “वास्तुशास्त्र का देवता” भी कहा जाता है। इनको “प्रथम इंजीनियर”, “देवताओं का इंजीनियर” और “मशीन का देवता” भी कहा जाता है।

विष्णुपुराण में विश्वकर्मा को देवताओं का “देव बढ़ई” कहा गया है। यह पूजा करने से अनेक फायदे है। इससे व्यापार में तरक्की होती है। पूजा करने से मशीन खराब नही होती है। व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती है। जिस व्यक्ति के पास एक कारखाना होता है उसके पास अनेक कारखाने हो जाते है, इस तरह की मान्यताएं है। सभी देवताओ में भगवान विश्वकर्मा का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होने अनेक प्रसिद्ध भवनों और वस्तुओ की रचना की। रावण के लिए सोने की लंका बनाई तो स्वर्ग में इंद्र का सिंघासन आपने बनाया। जब असुर देवताओं को सताने लगे तो इन्होने ऋषि दधीची की हड्डियों से इंद्र का वज्र बनाकर असुरो का नाश किया। रावण के अंत के बाद राम, लक्ष्मण, सीता व अन्य साथी पुष्पक विमान पर बैठकर अयोध्या नगरी लौटे थे। पुष्पक विमान का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। कर्ण का कुंडल इन्होने ही बनाया था। इसके अतिरिक्त भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, यमराज का कालदंड बनाया था। पांडवो के लिए शानदार इंद्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया जिससे कौरव चकित रह गये। हस्तिनापुर को भी इन्होने ही बनाया था। जगन्नाथ पूरी में “जगन्नाथ” मंदिर का निर्माण किया। इस तरह अनेक प्रसिद्ध भवनों का इन्होने निर्माण किया था। इसिलए इनको इंजिनियरों का देवता भी कहा जाता है।

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